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Hymn No. 1524 | Date: 22-Jan-2000
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जानूँ ना हूँ मैं कुछ, जो जानूँ उसको मानूँ ना।
जानूँ ना हूँ मैं कुछ, जो जानूँ उसको मानूँ ना।
खेल है अजीबो – गरीब, जीवन में तू है सबसे करीब।
तेरे होने का माँगू सबूत, जो मिटता है सदा उसको मानता।
अंधा हूँ आँख होते हुये, जागते हुये रहता हूँ सोता।
गुहार लगाता हूँ तुझसे करने की, करता नहीं तेरा कहा हुआ।
सुध ले ले प्रभु इस बेसुध रहने वाले जीव की तू।
एक बात सच है खोजना ना पड़ेगा यहाँ दूर्गुणों को तुझे।
कही छोटी सी बची है प्यार भरी आस तेरे होने की।
मेरी तरफ से ना मूँदना आँख तू, मर्जी में आये दे देना सजा तू।
कृपा करना बस इतना तू, तेरा नाम लेके सह जाये सब।


- डॉ.संतोष सिंह