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Hymn No. 1647 | Date: 05-Apr-2000
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आशिको को आशिकी के सिवाय आता नहीं कोई काम ढंग का।
आशिको को आशिकी के सिवाय आता नहीं कोई काम ढंग का।
हम तो रंगना चाहतें है तेरे प्यार के रंग में।
जंग हमारी किसी से ना है, जंग चल रहीं है खुद से।
बसा लेना चाहता हूँ तन – मन के कोने – कोने में छवि तेरी।
मैं कोई कवि तो नहीं, लिख सकूँ बेहतरीन शायरी प्यार पे तेरे।
चुरा - चुराके तेरे नजरों से करता हूँ कागद कारे ओ मेरे साँवरे।
अपना तो ना है कुछ ऐसा, जो सौंप सकूँ कदमों में तेरे।
ले ले तू कुछ भी, हो जायेगा हतप्रभ, जब देखेगा नाम खुदा आपे तेरा।
बातें तो कितनी भी अच्छी हो, अच्छा रखनां दिल को तू हमारे।
प्यार से विनंती करता हूँ प्रभु, प्यार बरसातें रखनां हमपे।
- डॉ.संतोष सिंह
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कर लेने दे इतरा के मुझे प्यार, हूँ झूठा सही तब भी तू कर लेना स्वीकार।
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डूब गया हूँ गम के अँधेरो में, बुझ गया जलता हुआ जो प्यार का चिराग।
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