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Hymn No. 1894 | Date: 27-Jul-2000
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मुझे ना है कोई गम, ना है मुझमे कोई खुशी।
मुझे ना है कोई गम, ना है मुझमे कोई खुशी।
कोई उड़ाये कितनी भी मेरी हँसी होता नहीं तनिक भी दुःखी।
ना ही मेरा कोई अतीत है, ना ही भविष्य इसलिये हूँ सुखी।
कोई क्या बढायेगा मान मेरा, जब कर ही न पाये अपमान।
मैं भीड़ में हूँ अकेला, अकेले रहते हुये रहूँ भीड़ में खोया।
सद्गति हों या दुर्गति हों ना सकती मेरी, पहचान तन से।
मन करे कुछ भी, उससे भी लेना – देना ना है मेरा कुछ का।
बुध्दि का कुछ सुनता नहीं, करना पड़े सफर कितना भी तन को।
विलासता हो या त्याग, भीतर की आग हो या शांती।
अगर ढुंढोगे मुझे तुम हो या वह, हर कहीं एक सा पाओगे।
बदलेगा नाम – बदलेंगा काम, स्वरूप भी होगा सुंदर – असुंदर।
पर निश्चित जानों ये उद्घोष ना है किसी घमंड़ी का।
सहजता – सरलता से रहता हूँ विद्यमान हर समय एक सा।
किसीको मिटाना किसीके वश की बात नहीं, यहाँ कोई स्वामीं – दास नहीं।
- डॉ.संतोष सिंह
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