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Hymn No. 2018 | Date: 05-Oct-2000
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समझाना है तू समझा दे, क्यूँ धरे तू स्वरूप इतने।
समझाना है तू समझा दे, क्यूँ धरे तू स्वरूप इतने।
जब तू था एक तो क्यूँ रखा अपना नाम अनेक ।
यहाँ तक तो ठीक था मर्म एक होते हुये धर्म बनाये अनेक।
उनके भी नाम बदले, रखा नाम अलग – अलग अपने निवास का।
अब तू ही बता तेरी एक ओर बलवान माया से भरी ताकत।
और हमारी नासमझी लड़ बैठे आपस में तो, दोष है किसका।
रौ में बहके कोई बात न हूं करता, जुड़ा है सब तथ्यों से।
भरे पड़े है इतिहास के पन्ने इंसा रूप में तेरी कारस्तानी से।
अरे लड़ाया तूने अपनी, छाया को छाया से देव – दानवं स्वरुप में।
नाम बदले, स्थान बदले काम वही का वही किया कर्मों के नाम पे।
न जाने क्या उपनाम मिला इंसा को, बहलाये मन तेरा ये मिथ्या जगत।
रहा तू अपनी जुगत में सदा, ये खेल – खेला अपना एकाकी पन दूर करने को।
- डॉ.संतोष सिंह
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