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Hymn No. 2020 | Date: 05-Oct-2000
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तपते हुये रेगिस्तान में तलाश रहती है राही को चश्में की।
तपते हुये रेगिस्तान में तलाश रहती है राही को चश्में की।
वैसे इस धरा पे तलाश थी हमको, तेरी न जाने कब से।
तेरी कृपा की बदौलत पाया हूँ न जाने दूंगा अब हाथों से।
बहुत खेल – खेला आँख – मिचौली का न जाने क्या क्या बनके।
अब तो कुछ न बनके सिमट जान है प्रियतम् तेरी बांहो में।
सफर न था कभी खत्म, होने वाला, मिलते ही तुझसे नजर आ गयी मंजिल।
झेला था बहुत कुछ झेलने जैसा न रह गया कुछ, तेरा साथ मिलते ही।
आगाह तूने बहुत बार किया, फिर भी न जाने क्यूँ ओखली में सर हमने दिया।
लौटा ले चल उसी जगह जहाँ प्यार की पीगें बढायीं थी संग तेरे।
याद तो न आ रहा है सब कुछ, पर होते हुये सब कुछ खाली खाली सा लगता है।
- डॉ.संतोष सिंह
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