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Hymn No. 2230 | Date: 29-Mar-2001
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हे। प्रभु बैठता हूँ हर रोज तेरे सम्मुख नामा का यथार्थ जीवन में उतारने के वास्ते।
हे। प्रभु बैठता हूँ हर रोज तेरे सम्मुख नामा का यथार्थ जीवन में उतारने के वास्ते।
हे। शिव आभास करा दे अंतर में छुपे इस जीवन को तेरे सत्यमय स्वरूप का।
हे। विष्णु जगत के पालन करने वाले, कैसे रमा है तू अणु अणु में दर्शन करा दे।
हे। ब्रम्हा हर पल तू तो रचता ब्रम्हाण्ड को, कैसे तू करे इस भेद में अभिर्थता का भेद।
हे। दुर्गे तू तो है माँ, आज तू ही मुझे समझा कैसे तू लड़ा दानवों से दुर्ग की रक्षा करते हुये।
हे। मुरली मनोहर कैसे तू तो खीचें दुनिया को सारे, सिखा दे बेसुरों को भी सुरों में बांध के।
हे। राम तुमने सहा सदा दुःखों को फिर भी रहे रक्षा करते मर्यादा की, सिखा दे जीना मर्यादा में हमको।
हे। हनुमान कैसे की सेवा भक्ति तुमने इतनी, बना दे तू मेरी पहचान इसको।
सीख जाऊँ तेरी हर सीख को, रिझा ले जाऊँ तुझको अपना मनमीत बनाके।
रह न जाये कहने करने को तुझसे, जीता रहूँ जीवन का हर पल तेरा होके।
- डॉ.संतोष सिंह
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एक एक पल के लिये शुक्रगुजार हूँ मालिक तेरा।
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