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Hymn No. 2283 | Date: 26-Apr-2001
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महफिल इक बार फिर से जम गयी, रंग गयी परम् प्रिय के प्यार में।
महफिल इक बार फिर से जम गयी, रंग गयी परम् प्रिय के प्यार में।
मारे है दुनिया के पर छोड़ते नहीं प्रिय को, डूबे रहे किसी रंग में पर दौड़ते है जो प्रिय के पास।
निर्मल इतने जानते हुये सब कुछ करते नहीं ख्याल कुछ, तत्परता से शरमाये जो रहते है मदद को।
आवाज देने से पहले दौड़ लगाते, कहने की जरूरत रहती नहीं कहा हुआ पहले ही कर जाते।
फिर भी कमी है ढेर सारी, जिन्हें काटता है यार अपनी कटाक्ष की कुल्हाड़ी से।
सदवृत्तों को उभारके बरसाता है अपनी परम् कृपा की बूंदो को निगाहों से।
अभी भी खाते है ठोकरे डगमगाते है कदम, पर जेहन में से यार का साथ छूटता नही कभी।
रूठते है न जाने कितनी बार दुनिया की रंगीनियों को देखके, पर यार की याद आते दौड़ते है पास उसके।
इश्क करते है अपने आप पे, अश्क बहाते हुये जाते है जो शरमाते पास उसके।
कृपा देखो सब जानके बनके अनजान फैलाये रहता है खड़ा बाहें वो,प्यार से सर पे हाथ फेरते ले चलता है साथ अपने।
- डॉ.संतोष सिंह
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