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Hymn No. 2327 | Date: 24-May-2001
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निराशाओं का दौर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा, बिना वजह मुस्कुराहट बढ़ती जा रही है।
निराशाओं का दौर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा, बिना वजह मुस्कुराहट बढ़ती जा रही है।
समझ नहीं पा रहा हूँ कि मूर्खों का सरताज हूँ या बेहआई की मिसाल।
वास्ता रखके तूने न रखा कभी, वास्ता चाहे कितनी बार मिला जो राह में तुझसे।
हद हो गयी जिंदगी में जद्दोजहद बढ़ती गयी, एक के बाद दूसरी सजा का दौर आता गया।
गुरेज न है किसी भी सजा से, कबूल करुँगा हंसते हुये, पर मानन होगा मेरी एक बात।
सजा जो भी होगी मिलेगी मुझे, न कि मेरे दोस्तो, गुरू, परिवार के किसी सदस्य को जरूर।
मेरा मन ओर दिल तेरे विचारों से ओत प्रोत हो, सजा से उपजी पीड़ा बढ़ाये तेरी प्रित को।
आर्थिक रूप से विपन्नता न घेरे कभी, भले ही अर्थ के सुख का आदि न बनूँ कभी।
मेरा जो भी हाल हो बेहाल न हो कोई दिल, ऐसे मौके पे आना तू मेरे घर जरूर।
कहकहे लगायेंगे मिल बैठके, कोई नया प्यार का गीत गुनगुनायेगे।
- डॉ.संतोष सिंह
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भग्न हृद्य से गा रहा हूँ गीत तेरा, मन के कोने कोने में आशाओं के दीप जलाने वास्ते,
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कतरा रहे थे भीड़ से हम, न कि तुझसे।
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