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Hymn No. 2331 | Date: 27-May-2001
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कैसे तू चैन में है हमको बेचैन बनाके, ऐ निर्मोही सब दोष न है हमारा कुछ दोष तो है तेरा।
कैसे तू चैन में है हमको बेचैन बनाके, ऐ निर्मोही सब दोष न है हमारा कुछ दोष तो है तेरा।
क्यों पढ़ायें आधा अधूरा प्रेम का पाठ, एक और बताये दुनिया की राह तो दूजी और समझाये दुनिया के बिना जाना।
ऐसी क्या गलती हुयी थी जो करे सुलूक तू ऐसा, पास बिठाके करे बर्ताव गैरों जैसा।
कभी लगे समझ गया सब कुछ कहा हुआ तेरा, तो फिर क्यो वर्तन में आते उलट जाये सब कुछ
अंदाज तेरा क्यो है इतना अजीब, जो लड्डू खिलाके कहें स्वाद न लेना तूम इसका।
कूद पड़ा धार को तू तेज कर जाये, कब इस मूढ़ मति के अंतर को अपना बनायेगा।
बेचैन रहके चैन न लेने दूंगा तुझको, गाज गिरे दुनिया की सारी मेरे उपर पर पीछा न छोंडूंगा।
माना कमी है मेरी पर करुँगा कोशीश पुरजोर, तेरे अनुरूप बनके जीने के वास्ते।
किंचित न दूंगा मौका अपनी और से, पर तू प्रेम रस का पान कराते जाना।
अबकी बार लड़ा दूंगा जान पर न आने दूंगा आंच तेरी आन पे।
- डॉ.संतोष सिंह
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बारंबार एक ही प्रयत्न में हूँ, सुलग उठे प्यार की आग जो है अंतर में।
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कुछ भी न था पास मेरे, फिर भी रखा तू साथ अपने।
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