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Hymn No. 2341 | Date: 06-Jun-2001
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समझ में आया गलती है कहाँ, पर उस कमी को पूरा करना न आया अभी।
समझ में आया गलती है कहाँ, पर उस कमी को पूरा करना न आया अभी।
जानते हुये भी करते है, अनचाहे को चाहके तेरे पास आये रोना रोते।
पहले तो था कर्मों से उपजा, अब तो आदत बनती जा रही है तन मन की।
खेल चल रहा है किस्मत का, जो ठौर सौंप रखी है मन और इच्छाओं की।
मिटाके भी भूख पूरी हो न रही है, होने पर शोर करता है मन अब नहीं कभी।
पर अब बहुत हो गया है, सब कुछ है मेरे हाथों में खेलना है जीवन की डगर पे।
हर साध पूरी हुयी न जाने कितने जन्मों में कितनी बार, अब सधना है तेरे वास्ते।
देर हुयी होगी पर अंधेर नहीं, जब उठा दिल तो दिल ने कहा हो गया है सवेरा।
वास्ता न दूंगा अपनी गिड़गिड़हट का, तेरे हिस्से में लगाऊँगा अंबार प्रेम ओर ज्ञान का।
न ही तुझको कहने करने से कभी रोकूंगा, मेरे हिस्से का दुःख भी होगा अहोभाग्य मेरा।
- डॉ.संतोष सिंह
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