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Hymn No. 2398 | Date: 20-Jul-2001
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तेरे पास आते आते बदलने लगते है गुनगुनाहट गीतों में।
तेरे पास आते आते बदलने लगते है गुनगुनाहट गीतों में।
भटकता हुआ मन भी जल्दी से जल्दी पहुँचना चाहता है पास तेरे।
न जाने तब कैसा सुरूर छाता है दिल पे, कहना होता है नामुमकिन।
रोकना होता है मुश्किल तब अपने आपको, खुशियाँ झलकती है चेहरे पे।
देखते बनती है तब मेरी आँखो की चमक, टिकती नहीं जो किसीकी नजर।
गजर थम सा जाता है, दुरियाँ कम होने का नाम नहीं लेती।
पड़ते नहीं पग जमीं पे, मेरा रोम रोम नर्तन करता है खुशी से।
मेरी हालत होती है उस नई नवेली बहु जैसी जो पहुँचती है पहली बार पिया के पास
सब्र का बांध छुट जाता है, बेसब्रा जो बन जाता हूँ।
मिलन की घड़ियो में न पुछो होता है क्या हाल, समर्पण कर देता हूँ जो तेरे चरणों में।
- डॉ.संतोष सिंह
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