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Hymn No. 26 | Date: 19-Aug-1996
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रीत, गीत, मीत, प्रीत बिन् कोई न पायें प्रभु को ।
रीत, गीत, मीत, प्रीत बिन् कोई न पायें प्रभु को ।
रीत ही रिवाज है जो सदा से चलती आयी ।
गीत मन की तरंग है जो जीने की राह दिखायें ।
मीत मन का भाव जिसने जिस रूप में देखा ।
उसने उस रूप में पाया ।
प्रीत है ह्रदय का प्रेम इस बिन यह जग है अधूरा ।
जिनके अंदर ये चार वो ही कहलाए मानव ।
बाकी तो बस मानव तन है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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