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Hymn No. 2848 | Date: 19-Oct-2004
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मत पूँछो खेल कैसा है जिंदगी का, जहाँ इम्हान के बाद इम्हान होता है।
मत पूँछो खेल कैसा है जिंदगी का, जहाँ इम्हान के बाद इम्हान होता है।
एक हालत से सम्भल न पाये, दूजे हालातों का सामना करता पड़ता है।
चैन नही होता मन में, ना करने को दिल पल पल रोता है।
मुख मोड़ते हैं अपने, जो सपनो में ना सोच रखा था वो होता है।
करूणामयी करूणा कर करके हारे, और हम हारते है अपने आप से।
जागते हुये सोते हैं, अपनी हालातों को लेके हालातों को दोष देते है।
समय रहते चेत न पाये, जब हाथ से निकला तब तब पछताते हैं।
बहुत चाहा कसम से यहाँ रहे हुये, कुछ कर जायें तेरा चाहा हुआ।
मुक्कदर के लिखे हुये को न तोड़ पाया, कर्मों को शिंकजा कसता जाये।
मेरी हालत को देखके चेत जाना ओ दिवानों यही बताने वास्ते गीत गाता हूँ।
- डॉ.संतोष सिंह
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बात बनते बनते बिगड़ जाये, पास आते आते दूर चला जाऊँ।
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