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Hymn No. 2856 | Date: 28-Oct-2004
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गुरूवर ओ गुरूवर हमको तुम ना ऐसे त्यागो, चाहे अभी ही मार डालो।
गुरूवर ओ गुरूवर हमको तुम ना ऐसे त्यागो, चाहे अभी ही मार डालो।
तुम्हारे उपकारो के चलते कायम हूँ, कब का रौंदा गया हाता घोर कर्मों से।
बेडियाँ डाली पैरों मैं, पहनायी जंजीर हाथों मैं देखते देखते क्या हालत कर दी।
लुटाया तूने हमपें सब कुछ तेरा, फिर न आये बाज मनमानियों से अपने।
जो ना सोचा था सपनो में, वो हाल कर दिया हमने, गुरूवर ओ गुरूवर...
अपनी कृपा पात्र बनाया तो भी उस चरण कमलों का, अभानता की निंद मैं कैसे हूँ सोया।
रोता हूँ अहसास करके कर्मों को, अकेले में बिसुरता हूँ कुछ और पाने को।
क्यों ऐसा बनता चला गया, क्यों ना तेरा कहा करता गया, गुरूवर ओ गुरूवर... त्यागो ना तुम हमको ऐसे।
चाहत है भर दे एक बार को फिर से दो दम खम से, करता जाऊँ कहाँ तेरा।
अब तो मान जाऊँ गुरूवर ओ गुरूवर त्यागो ना तुम हमको ऐसे।
- डॉ.संतोष सिंह
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