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Hymn No. 392 | Date: 03-Oct-1998
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हर बात सच – सच तुझसे कह देना चाहता हूँ, भले ही तू है जानता।
हर बात सच – सच तुझसे कह देना चाहता हूँ, भले ही तू है जानता।
मन के सारे भावों को तेरे श्री चरणों मैं देना चाहता हूँ सौंप, समर्पित होके जीना चाहता हूँ।
जिससे में तुझसे अलग – अलग पडूं, उन सबको देना चाहता हूँ त्याग बनाके रास्त तेरे प्रति।
प्यार सिर्फ प्यार में तुझसे करना हूँ चाहता, दिल को तेरे दिल से लेना चाहता हूँ बांध।
तेरे आश्रय में रहना हूँ चाहता, हर आश्रय का त्याग करकें ।
साध लुंगा अपने आपको तेरी कृपा से तेरे लायक बननें के लिये ।
तू है सरताज अनंत ब्रह्माण्ड का, खाक हें हम इस जमीं के ।
कातर से स्वर है हमारें, नम आँखें और दिल है सहमा सा मन मेरा तैयार है चरणों में बिछने के वास्ते।
ढेर सारे शहो को जानकें क्याँ करेंगे, जब चल ना पायें तेरे बतायें राह पे ।
मजा आता है हमें तेरी सजा में, जो भीनी – भीनी खुशबू की तरह याद दील जाती है तेरी ।
- डॉ.संतोष सिंह
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