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Hymn No. 4 | Date: 01-May-1996
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यत्र तत्र सर्वत्र, तू ही तू है ।
यत्र तत्र सर्वत्र, तू ही तू है ।
कण – कण में राजत है, विराजत है ।
अनेक हो कि, एक तू ही तू है ।
ज्ञात हो कि, अज्ञात तू ही तू है ।
आकार हो कि, निराकार तू ही तू है ।
नित्य हो कि; अनित्य तू ही तू है ।
गुणवान हो कि, निर्गुण तू ही तू है ।
सर्वदा समभाव से सर्वत्र तू ही तू है ।
- डॉ.संतोष सिंह
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