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Hymn No. 51 | Date: 08-Nov-1996
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क्यों करता रहा है इतनी इतंजारी, बढ़ती जा रही है मोरी बेकरारी ।
क्यों करता रहा है इतनी इतंजारी, बढ़ती जा रही है मोरी बेकरारी ।
कहीं ऐसा न हो बनते – बनते, जाये ये मूर्त टूट ना ।
हम क्षुद्र की ऐसा क्या बिसात, जो दे सके तेरा इम्तहान ।
रंगा जा चुकी है मोरी जिंदगी, का हर पहलू इच्छाओं के रंगों से ।
रंग सकेगा ना तू अपने रंग से, ऐसा कोई कोना ना है छूटा ।
कुछ भी शेष नहीं है मेरे पास, बस एक टुटा हुआ दिल है ।
जोड सके तो तू जोड देना; पर उसको तू ना खोलना ।
कहते है सब, तू तो है सर्वव्यापी, पर देता हूँ में तुझे बता,
छिपा रखा हूँ तमन्नाओं की राख, तोड़ना है दम मोहे अब तेरे चरणों में ।
- डॉ.संतोष सिंह
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