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Hymn No. 508 | Date: 17-Dec-1998
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प्रिय मेरे तेरी प्रतीक्षा में बितायें कई - कई जन्म, मुलाकात हुई तेरी कृपा से।
प्रिय मेरे तेरी प्रतीक्षा में बितायें कई - कई जन्म, मुलाकात हुई तेरी कृपा से।
तू महासागर है, तुझमें स्थित कई - कई ब्रह्माण्ड, बूंदे है हम उस सागर की।
तुझसे हुये उत्पन्न हम तुझमें ही लौट जान है आज नहीं तो कल।
शाश्वत तू अनादि काल से अनंत काल तक, हमारा मिटना बनना है तेरे द्वारा।
रत है तू हर कर्म में हर बंधन से हो मुक्त विरक्त रहता है तू सदा से ।
निश्चित नहीं लगता तेरे बारे में कुछ कहना, हर कहने से कहीं तू है उपर ।
रमतें है ऋषी – मुनीं तेरे अथाह सागर में, तेरी सत्ता देखतें हो पातें है दीवानें ।
इस जग का हर कन् क्षण भंगुर है, काल के साथ बदलें स्वरूप उसका।
सब कूछ तुझमें समाया है, तुझसे बाहर कहीं कूछ नहीं तू ही है सदा सत्य ।
नतमस्तक हूँ तेरे चरणों में, तेरी सत्ता का बखान कर नहीं सकते मुझ जैसे लाखों – अरबों।
- डॉ.संतोष सिंह
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जो बंध गये तेरे बंधन में, परवाह कीस बात का करना ।
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जगा के मालीक सुन लें तू पुकार हमारी, जब – जब घिरतें है घोर कर्मों से।
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