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Hymn No. 517 | Date: 22-Dec-1998
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मन मे अंगार लगती है तो लगने दें, इस दिल को अंगार तू मत लगा ।
मन मे अंगार लगती है तो लगने दें, इस दिल को अंगार तू मत लगा ।
मन की अंगार दो क्षण में बुझ जायेगी, दिल की अंगार को बुझानें के लिये कई जनम लेनें पड़ते है।
मन तो मनमानी करता है हर बात में, दिल से कहीं हुयीं हर बात सच्ची होती है ।
तन भूगतें सजा मन के कीयें हुये कर्मों का, दिल बिचारा उलझा जाता है अच्छे बूरे ख्यालों में।
साधना पड़ता है मन को, सध जाता है जीवन हमारा सारा, सच्चे दिल की आवाज खुदा सनता है
सधे हुये मन से दिल लगाके गीत गातें है प्रभु के बैखोफ होके जीते है निर्मल दिलवाले।
उनकें छेड़े हुये तान पे मदमस्त होके थिरकता हुआ अवतरित होता है प्रभु जमीं पे ।
णस्ती में सोया हुआ उसका दीवाना रमा रहता है परम् में, मदमस्ती का आलम् टूटनें पे – अलग पाता है अपने को प्रियतम् से ।
वो तो खोया रहना चाहता है सदा सच्चिदानंद में बनके उसका चरण रज ।
क्षण भर के लिये स्वीकार ना है उसे क्षणभंगुर जीवन, वो तो सिमट जान चाहता हें प्रभु के बाहो में ।
- डॉ.संतोष सिंह
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जनम लें रहा है मन के भीतर तेरे प्यार का अंकूर ।
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कीतनी कसर बाकी है पूरी होनें में खास हमारीं ।
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