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Hymn No. 53 | Date: 18-Nov-1996
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झूठी है, झूठी है, मेरी हर इबादत छूटी है,
झूठी है, झूठी है, मेरी हर इबादत छूटी है,
इच्छाओं के धरातल पे बुनियाद डाली है मैंने ।
इर्ष्याओं की दीवार खडी की है, अपने चारों और;
लालच और मोह की डाली है छत मैंने ।
वासनायें और कामनायें इस धर की खिडकी और दरवाजे है ।
अरे अंदर से जर्जर हो चुकी है मेरी इमारत ।
आँखों में आँसू है गम ना है मुझे उसका,
दिल में है इक् आस कभी तो तू करेगा निवास।
- डॉ.संतोष सिंह
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ऐसी कोई बात न थी, की हमने तुझको दिया भुला ।
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इंतजारी है तुझसे मुलाकात की, इस आस से चलती है साँस मेरी ।
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