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Hymn No. 58 | Date: 03-Dec-1996
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जान के अंजान बनता है दुःखों से तू मेरे ।
जान के अंजान बनता है दुःखों से तू मेरे ।
ऐसी कोई बात ना है जो तू न जानता हो ।
आये या न आये मेरे आँसू आँखो में ।
चाहे या न चाहे छिप नहीं सकते तेरी नजरों से ।
दर्द मन में हो या तन पे सहना तो है मुझे ।
कर्म मन ने किया या तन ने सहना तो है मुझे ।
अपने कर्मों का उलाहना ना देता हूँ तुझे ।
गाहे – बगाहे तेरे गीतें को गाने का रखता हूँ हक में ।
गल्तियों का हूँ पुतला गर तूने बनाया है इंन्सान मुझे ।
- डॉ.संतोष सिंह
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