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Quote No. 1003 | Date: 26-Jan-2013
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एक राह चला हूँ, दिन-रात ख़्वाब बुनता हूँ |
एक राह चला हूँ, दिन-रात ख़्वाब बुनता हूँ |
यार मेरा प्यार क्यों कम है, विरह का दौर क्यों न होता ख़त्म है |
 

देवेंद्र घिया( काका )


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