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Quote No. 357 | Date: 04-Jan-2002
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कागज़ और कलम बन गए हैं मेरे दिल के हाथ और पग |
कागज़ और कलम बन गए हैं मेरे दिल के हाथ और पग |
जहाँ यादों की स्याही से उकेरे जाते हैं प्यार के नगमों को |
 

देवेंद्र घिया( काका )


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