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Quote No. 526 | Date: 09-Oct-2002
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कर्म और कीस्मत इतने गुंथे हुए हैं, एक दूजे में |
कर्म और कीस्मत इतने गुंथे हुए हैं, एक दूजे में |
कब कौन खींचे रुआ को, कोई बिरला ही जाने |
और तो और इससे कोई सदगुरु ही मुक्त कराये |
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अंदाजे प्यार का बयाँ करना होता है मुश्किल |
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जिसने दिया था सहारा, उसी को बेसहारा करने पे तुला हूँ |
देवेंद्र घिया( काका )
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