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Quote No. 690 | Date: 04-Dec-2004
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ज़िंदगी का न कोई ठिकाना,
ज़िंदगी का न कोई ठिकाना,
संजो के भी संजो न पाया |
हर श्वासों पे बस जो एक और श्वास को छूटते पाया |
 

देवेंद्र घिया( काका )


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