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Quote No. 733 | Date: 05-Aug-2005
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कीचड़ में खिलते कमल को पाया, पंक्तियों में मन को मोर भाया |
कीचड़ में खिलते कमल को पाया, पंक्तियों में मन को मोर भाया |
खाने की बात आई तो मीठे ने लुभाया, जन्म दर जन्म के वाद इंसान का रूप पाया | और जब ईश्वर ने चाहा, तब काकाजी ने दिल लुभाया |
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याद करते करते 'फरियादों का फंसाना’ बनते गया |
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कुछ तो ऐसा हो जो दिल से निकले, और तेरे दिल को छू जाए |
देवेंद्र घिया( काका )
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