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Quote No. 867 | Date: 10-May-2009
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आदत हो गयी है तपती दोपहरिया की, तू बता सांझ कैसे रास आये |
आदत हो गयी है तपती दोपहरिया की, तू बता सांझ कैसे रास आये |
जब कोई बहुत अपनापन सा लगता है, (कीसी में), तो समय ख़त्म होने लगता है |
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हर आँसू की कीमत होती है, उसमे कीसीकी मोहब्बत होती है |
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नशा तो न बोतल में है न जाम में |
देवेंद्र घिया( काका )
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