“ दिनांक: 27-Apr-2009 हर हालत में पाने की तमन्ना सबको है, मतवाला न जाने क्यों खोने पे तूला है | इरादे गज़ब के है, जो क़यामत के दिनों में चैन पा रहा है | हसरतो का हाल, पानी के बुलबुलों की तरह हो गया है | और कचासो का अंत कहा, जो सारे फसादों का जड़ है | चैन की बंसी बजती है, और तरन्नुम में गोते लगाता है | सवाल दर सवाल की झड़ी है, पर उत्तर की कीसको ना पड़ी है | मर-मरके जीता हूँ, पर तुझमे खुदको सजोता हूँ | लागी ऐसी लगन है, जो हर पल बेसब्रा बनाते जाए | ” - डॉ.संतोष सिंह Share