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दिनांक: 28-Apr-2009
गहरे गहरे और गहरे उतरते जा रहा हूँ |
एक के बाद एक न जाने कीतने हीरे-मोती देखके मुस्करा रहा हूँ |
दंग हो जाता हूँ, सारे खजानों को समेटे चुपचाप जो तू मुस्कुराता है |
कीतना भी करूँ वाह-वाह तेरा शब्द न है पास मेरे |
तेरी शालीनता का बयान करते थकता नहीं दिल मेरा |
रोम-रोम में हर्ष होता है, तेरी महानता को देख देखके |
इस अदने के आगे, बाहें फैलाये क्यों है खड़ा तू |
कोरे अल्फाजों का मालिक हूँ, न जाने कीतने अरमानों का कातिल हूँ |
डरता हूँ और गहरे जाने से पर अनजाने में तुझे प्यार कर बैठता हूँ |
मिट्टी के जिस्म को मिट्टी में मिल जाना है तेरे सिवाय न कोई मेरा ठिकाना है |


- डॉ.संतोष सिंह


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