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Hymn No. 1214 | Date: 17-Jul-1999
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इस जहाँ में है इक तेरा सहारा, नहीं है कोई और हमारा ।
इस जहाँ में है इक तेरा सहारा, नहीं है कोई और हमारा ।
मुसाफिर बनकर आए है, मुसाफिरी में कटेगी ये सारी डगर ।
हर एक कदम पर प्रेम के सहारे बढ़ रहे है तेरी और हम ।
हाथों में ना है कुछ हमारे, जो कुछ भी होगा तेरे मुताबिक ।
दुरियाँ बहुत है तेर-मेरे बीच तो क्या, आस्था का सेतु तो है हमारे बीच ।
बेपरवाह हो चुका हूँ प्यार में तेरे, कदम भी छोड़ रहे है दृढता की छाप डगर पर
मिटना मेरा तय है, पर ना हटूँगा मैं, प्यार की डगर से ।
प्रभु मूढ़ मति है मेरी, समझ न आए ज्ञान की बातें मुझे ।
घायल हुआ हूँ जब से प्यार में तेरे, दीवाना बनकर घूम रहा हूँ ।
दीवानगी बदल जाए मेरी पागल प्रेमी में, बेभान होकर मस्त रहूँ मैं तुझमें ।


- डॉ.संतोष सिंह