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Hymn No. 121 | Date: 18-Feb-1998
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अलविदा कहने को हूँ मैं तैयार, हर उस चीज को जो तुझसे दूर ले जाये मुझको
अलविदा कहने को हूँ मैं तैयार, हर उस चीज को जो तुझसे दूर ले जाये मुझको
संगत करने को हूँ तैयार में हर उस चीज का जो तेरे पास ले आये ।
अपनी प्यारी से प्यारी चीज को देने को हूँ तैयार मैं तूझे पाने के लिये;
तेरी एक नजर के लिये तुझसे पायी अपनी सारी अमानत लुटाने को हूँ तैयार में तूझपे ।
हर बार में तुझपे कुर्बान करना चाँहू इस जीवन को तुझे पाने के लिये ।
बेजान हो या जानदार, सब कुछ तो तेरी ही अमानत है, तो तुझप लुटाने को देर क्यों करनी। मैं तेरा बन जाऊँ ।
तब मरना - जीना हो जायेगा एक समान मिलने और बिछुडने की खुशी और गम कहाँ ।
- डॉ.संतोष सिंह
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