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Hymn No. 1313 | Date: 04-Oct-1999
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इक दिन की बात बताऊँ, सच्चा-सच्चा हाल सुनाऊँ ।
इक दिन की बात बताऊँ, सच्चा-सच्चा हाल सुनाऊँ ।
हमने ठानी खोजने की तुझे, मति मारी गई थी जो मेरी ।
निकल पड़ा हर छोर पर, नदी हो या नाले, ढूँढे सागर सारे ।
घाटी हो या मैदान, कुछ भी ना छोड़ा पहुँचे पर्वत के उस पार ।
देश बदले, वेश बदले, गाँव हो या शहर, बदलता रहा वीराना भी ।
थककर हो चूर, बैठा राह के किनारे, पलक झपकते झपकी आँख मेरी ।
जैसे किसी ने हो झकझोरा, मुस्कुरा के पुछा, तू तो निकला था ढूँढने मुझको ।
शरमाकर कहा हमने हो गए थे अहंकारी हम, पर अब तो बता दे तू रहता है कहाँ ।
अरे.. पगले पुकारा होता गर दिल से, तो कब का पाता पास तेरे ।
जाना ना होता कहीं और, जिधर जाता, उधर तू पाता मुझे ।


- डॉ.संतोष सिंह