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Hymn No. 1312 | Date: 04-Oct-1999
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जो मुझमें है वही तुझमें, कैसे झुकाऊँ सिर परम पिता का ।
जो मुझमें है वही तुझमें, कैसे झुकाऊँ सिर परम पिता का ।
प्रणाम ना चाहिए इस तन को, तुझमें भी तो है छिपा राम ।
काम कोई क्या दे देगा, जब लेता रहूँगा उसका नाम ।
मिटना तय है उसका, जिसने बाँधा खुद को तन-मन में ।
ना है आँख-कान, ना ही बुद्धि तेरी, मिला है साथ इनका ।
जिस दर को छोड़ा था अहंकार में, उस दर पर लौटने के वास्ते ।
अपना-पराया, छोटा हो या बड़ा, चाहे कोई भी जात, मिटना तय है तेरा ।
वक्त रहते गोता ना लगाया अपने भीतर, तो प्रभु को क्या तू पाएगा ।
हर नियम बंधन से परे, कण हो या मन, रहता है सबके भीतर ।
न जाना है कोई और धाम, काशी-मथुरा तो है दिल में हमारे ।


- डॉ.संतोष सिंह