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Hymn No. 1434 | Date: 10-Dec-1999
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समय-समय का फेर है, जीवन धरा पे कैद है।
समय-समय का फेर है, जीवन धरा पे कैद है।
कभी उन्मुक्त हो गगन में विचरा करते थे, अब कैद है तन-मन में।
मेल बैठता नहीं मेरा इससे, तोड़ना है इस जेल को।
सोचो तो सारे ख्वाब है, उठने का ना लेता हूँ नाम।
पिलाया यार ने प्यार का जाम, उड़ने को हो उठा हूँ बेताब।
समझ कभी – कभार गड़बढ़ा जाये, ख्वाब तब देखा था कि आज।
जब – जब पुकारा सबसे करीब पाया प्यार को, साया ने भी छोड़ा साथ प्यार ने ना छोड़ा साथ।
कर दे अंत तू इस पहेली का, ले चल तू हमको अपना बनाके।
बेचैन है मन इंतजार करते तेरा, ना पड़े अब किसी और फेरे में।
गैर बन चुका हूँ अपने आप से, जब से खोया हूँ प्यार में तेरे।


- डॉ.संतोष सिंह