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Hymn No. 1468 | Date: 28-Dec-1999
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पहुँचेगा इक् – इक् शब्द मेरा, करुँगा प्यार मैं तुझसे इतना।
पहुँचेगा इक् – इक् शब्द मेरा, करुँगा प्यार मैं तुझसे इतना।
बयाँ ना कर सकता हूँ, प्यार कितना करता हूँ मैं तुझसे।
भौरे की तरह दम तोड़ देना चाहता हूँ लिपटके दामन से तेरे।
पड़ जाऊँ मैं कितना भी तुझसे अलग – अलग, दूर ना हो सकता मन से।
बताने को कुछ ना है पास मेरे, जो दिल हो चुका है तेरा।
जताके सताना ना चाहूँ ऐसां कुछ भी ना है जो तू ना हो जानता।
पता नहीं कि तू रूठा है या खुश हम विरह में दिल सोचता सदा।
अदा करना कुछ मेरे वश में ना है तो तू बन गया है जो मेरा खुदा।
बात ना मैं बनाता हूँ, अकेले रहने पे उपजती है ये बातें दिल में।
तू जानता है सब कुछ जानता हूँ, दिल का हर कोना खोल के रख देना चाहता हूँ।


- डॉ.संतोष सिंह