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Hymn No. 1518 | Date: 15-Jan-2000
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फिर भी माने ना मेरा दिल, रहना चाहे हर पल करीब तेरे।
फिर भी माने ना मेरा दिल, रहना चाहे हर पल करीब तेरे।
ये कैसी है सजा, इसमें कौंन सी छुपि है तेरी रजा।
मजा नहीं आता हमको तेंरे इस खेल से।
जीवन बनता जा रहा है जेल, मेल नहीं खाता मेरा किसी और से।
ना मुझे चाहिये कोई और ठौर, गौर कर ले तू मेंरे इस गीत पे।
बंधा हुआ हूँ मैं तुझसे, ना ही दुनिया के लोगों से।
होनी होगी जो भी गति, होगी वो तो इस तन की।
मैं तो हो चुका हूँ तेरे साथ साथी, तो कैसे बनूँगा किसी और का मीत।
जीत मेरी तय है चूँकिं हार चुका हूँ दिल को तेरे हाथों।
अब रूकना हो गया है मुश्किल, जब तक मिट न जाय दूरी पूरी।


- डॉ.संतोष सिंह