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Hymn No. 1517 | Date: 15-Jan-2000
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खेलता है हर कोई खेल हमारे जीवन के संग।
खेलता है हर कोई खेल हमारे जीवन के संग।
खेलने क्यों देते है खेल हम हमारे जीवन से।
हर होनी – अनहोनी के लिये जिम्मेदार है कर्म हमारे।
प्रारब्ध के हाथों लिखा क्यों गया भविष्य हमारा।
सहारे टिका हुआ है तेरे संसार सारा, क्यों है अलग हम।
कभी तो हम होंगे एक, कैसे हुआ अलग तुझसे।
ऐसा खेल क्यों तुने रचा, जिसकी मिलती है सजा हमको।
होना है अंत तेरे हाथों, निमित्त बनाना भी है हाथों तेरे।
जो भी हो तेरी मर्जी से, सब कुछ मंजूर है हमको।
हमको ना था स्वीकार कभी वजूद अपना पृथक तुझसे।


- डॉ.संतोष सिंह