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Hymn No. 1526 | Date: 22-Jan-2000
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कैसे पार पाऊँगा तेरे बनाये अथाह काम सागर से ।
कैसे पार पाऊँगा तेरे बनाये अथाह काम सागर से ।
इच्छायें मन के साथ होती रहती है प्रवृत्त पल – पल उस ओर।
तोड़ना चाहता हूँ तेरे बनाये वासनाओं के चक्रव्यूह को।
जब जन्मा हूँ मैं तुझसे, तो हो गया कैसे कमजोर इतना।
हर बार खड़ा किया तूने तेरी कृपा से, फिर क्यों लड़खड़ा गया।
अड़ा रहना चाहता हूँ इच्छा रूपि तूफानों के बीच।
ऐसा कौंन सा किया था पाप, जो लगा मुझ्को शॉप ऐसा।
मुक्त होने के लिये जन्मा था तो क्यों बंधने की ओर चला।
तेरी भक्ति में तन्मय होके, सो जाना चाहता हूँ गोद में तेरे।
प्यार के काबिल नहीं तो सेवक बनाकें पास रख ले तेरे।


- डॉ.संतोष सिंह