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Hymn No. 1527 | Date: 22-Jan-2000
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बाँध ले तू हमको प्रेम की डोर से, छुढ़ा ना सके माया।
बाँध ले तू हमको प्रेम की डोर से, छुढ़ा ना सके माया।
जहाँ भी जाऊँ रहूँ बंधा तेरे प्रेम में, छू ना सके वासनायें।
मगन रहूँ मैं तुझमे, गाते हुये तेरे प्रेम गीतों को।
जीतता चला जाउँ हर चक्रव्यूह को तेरा नाम ले लेके।
औकात मैं – मैं का बढ़ाना नहीं चाहता, सौगात देता रहूँ तुझे प्रेम की।
मेरा ना है किसी पे अधिकार ना ही स्वयं पे, मैं रहूँ बस तुझमें।
छाई रहे चाहे दुखों की घोर बदली मुझपे, रहूँ खोये हुये तुझमें।
दशा मेरे तन की हो कैसी भी, नशा ना होने देना तू कम प्यार का।
इम्तिहान तू लेना जरूर मेरा पर कृपा करने से ना चूकनां।
रूकना नहीं चाहता हूँ हो जाये चाहे कुछ भी तेरे प्यार के वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह