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Hymn No. 1549 | Date: 03-Feb-2000
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बैठे है प्रभु सखियन् के संग, छेड़ते हुये नये – नये नगमें।
बैठे है प्रभु सखियन् के संग, छेड़ते हुये नये – नये नगमें।
हवा हो चुका है मन, बेसुध सा पड़ा है तन सामने उसके।
अपलक निहारतें हुये आँखों ही आँखों से प्रेम रस पीते हुये।
श्वास हो गया है निशेष, भूल गया है धड़कना दिल मेरा।
प्यार की धुन में काल चलना भूल गया, जो इसके संग अकाल हूआ मैं।
रंग ला रह है प्यार उसका, हो चला बदरंग तन मेरा।
आलम छाया हुआ है मस्ती का, अजीब सुकून है दिल को।
हर अहसास मिटता जा रहा है तन – मन पे से, कुछ का ना रहा ध्यान।
सुनी हुईं बातें होने लगी सच, जो रच – बस गया दिल में तू।
रही ना अब कोई बात मेरी, जब से हो गया प्रभु मैं तेरा।


- डॉ.संतोष सिंह