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Hymn No. 1645 | Date: 05-Apr-2000
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हमपे लुटाया तूने अप्रितम प्यार अपना, कुछ और कर दिखाने के वास्ते।
हमपे लुटाया तूने अप्रितम प्यार अपना, कुछ और कर दिखाने के वास्ते।
मास का टुकड़ा कहाँ तेरा न करके, बना कालीदास का नया अवतार।
अद्भुत कृपा तूने बरसायी, हरे हम अपने भाइयों की पीड़ा तन – मन की।
निकला मैं काठ का उल्लू, अंधा हो गया तेरी माया के साम्राज्य में।
उपजाया है तूने अपने भीतर से, सारे ब्रह्माण्ड को पलक झपकते।
बनाया है तो तूने मुझे, यहाँ आके ऐसा बदला हैरत पड़ गया तू।
तू भी न माना, उठाया बीढ़ा इस मुरख को जीते जी बदल देने का।
झेला न जाने तूने कितने मेरे क्रूर कर्मों को पीड़ा को, फिर भी ना दूर किया।
मरे हुये को जीवित करते देखा, जीवित को जीवित तू कैसे करेगा।
प्रभु मेरे दुखों को तू ना झेल, मैं तो था सदा से फेल।
- डॉ.संतोष सिंह
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दिल की क्यारी में, खिले है फूल प्यार के।
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कर लेने दे इतरा के मुझे प्यार, हूँ झूठा सही तब भी तू कर लेना स्वीकार।
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