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Hymn No. 1737 | Date: 10-May-2000
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ऐ चराचर के मालीक, हम है तेरे अनुचर।
ऐ चराचर के मालीक, हम है तेरे अनुचर।
ये क्या कम है जो थे दूर, अब पास तेरे है रह लेते।
हाँ उपजता मन में बहुत कुछ, कैसे तुझसे हो जाये और प्यार।
तू है तीनों लोकों का स्वामी, बंदा तो है खाकसार।
बहक के कहीं कर न जाऊँ, बहुत बड़ी अनचाही जुर्रत।
जिसे कर ना सकें तू स्वीकार, बनना पड़े पाप का भागीदार।
सजा का ना है कोई डर, तेरे दिल को ना पहुँचाना चाहूँ चोट।
भुगता तो बहुत है भुगत लेंगे ऐसे – वैसे करके हम और।
दामोदार है तुझपे, पहुँचाये कहीं भी तू।
गुजारिश है बस इतनी, रहना मन में मेरे तू सदा।


- डॉ.संतोष सिंह