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Hymn No. 1773 | Date: 24-May-2000
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कुछ भी कह लो, सच – सच रहता है सदा।
कुछ भी कह लो, सच – सच रहता है सदा।
बदलता है सब कुछ, बदलता ना है स्वरूप सच का।
कुरूप है कि सुंदर, देखने वाले के मन में है स्वरूप।
दंग रह जायेगा तू, जो चढ़ता न है इसपे कोई ओर रंग।
खालिश रहता है, जरूरी तो होती है स्वीकारने की।
मान लो प्रभु के रूप के रहते है दो पहलू सबमे।
प्रेम और सत्य यें दोनों तो ओत – प्रोत एक दूजे में।
पहचान तो छूपी रहती है पहचानने वालो की नजरों में।
जिसके अंदर जितना निर्मल भाव होगा, वैसा स्वरूप पायेगा तू।
बिन कुछ कहे सत्य में खोये हुये हर पल वो मुस्करायेगा।


- डॉ.संतोष सिंह