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Hymn No. 1836 | Date: 30-Jun-2000
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प्यार पे आगे न हूँ कुछ सोच पाता।
प्यार पे आगे न हूँ कुछ सोच पाता।
प्यार के पीछे न हूँ कुछ जान पाता।
मेरी मर्जी मिट गयी है तेरी मर्जी में।
जो शुरू हुआ प्यार का दौर तो हो गये चूप हम।
दम न रहा बयाँ करने का प्यार में मिले गमों को।
जमें या ना जमें, परे उससे पड़े है पीछे तेरे।
कबूल करना होगा कदमों में पड़े इस धुल को।
घोल दे जिसमे तू धुल जाऊँगा बिना जहमत।
ऐ खुदा तेरी रहमत पे हूँ जिंदा हमेशा से।
खाकसार को मिली हिम्मत तेरे प्यार से कहने के वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह