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Hymn No. 1838 | Date: 01-Jul-2000
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फरमाना गौर जरा हमपे अभी तक ठौर ना मिला तेरे दर पे।
फरमाना गौर जरा हमपे अभी तक ठौर ना मिला तेरे दर पे।
और हुआ जीवन में कई बार, पर अभी तक ना हुआ ऊजास भीतर।
माना होगी लाख कमियाँ हममें, पर यें तो हुयी ना बात टालने की।
बहलाना था तो क्यूँ बुलाया पास अपने, बनने दिया तो माया का दास।
कबूल करता हूँ इक् बार भी तूने ना फाँसा, झाँसा दिया हर बार हमने।
तेरे बिना जाता कहाँ मैं और, तेरा न चला तो चलेगा ना किसीका जोर।
मन में नाचे कितना भी माया का मोर, पर दिल तो भागें तेरी ओर।
आधे – अधुरे खेल से अच्छा हूँ, खेलने में लगा हूँ बाजी जाँन की।
हार हो या जीत करुँगा हँसके कबूल, पिता रहे बस उसमें तेरी रजा।
सजा जो होगी तो सजा न रह पायेगी, तेरी रजा से उसमें भी मजा आयेगा।


- डॉ.संतोष सिंह