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Hymn No. 1884 | Date: 23-Jul-2000
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जन्मजात गुणों का रहा सर्वथा अभाव, इकटे हुये मन में दुनिया भरके दूभर्वि।
जन्मजात गुणों का रहा सर्वथा अभाव, इकटे हुये मन में दुनिया भरके दूभर्वि।
किस मुंह से कहूँ में तुझसे कुछ, जब हों भरा मन में मैल।
देखना हो किसीको अगर साक्षात् दुर्गुणों से भरा इंसा तो देखो मुझे।
एक – दो नहीं न जाने कितने दुनिया भरकी कमियों का खजाना हूँ मैं।
चाहता तो बहुत हूँ परम् पिता से, पर जीता – जागता नमूना हूँ निकम्मेपन का।
मेरा रंग – ढंग है ऐसा, कभी जोकर तो कभी मसखरा हूँ लगता।
मजा आती है भले रोऊँ भीतर ही भीतर, जब हंसते है लोग दिल खोलकें।
प्रभु भी हो जाता है परेशां क्या करने के लिये भेजा था, क्या करता है।
किसकी नजरों में न उतरा खरा, इतना भरा था जिजदिखा सें।
दिनों दिन होती जा रही है दशा खरदब, पर मौज में न आने देना।
- डॉ.संतोष सिंह
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