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Hymn No. 1979 | Date: 12-Sep-2000
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मुझसे जीयारा है कौन हिंदू, मुझसे सच्चा ना कोई मुसलमां।
मुझसे जीयारा है कौन हिंदू, मुझसे सच्चा ना कोई मुसलमां।
सर से पांव तक हूँ मैं ईसाई, रोम – रोम में मेरे सीखता है समाई।
तुम्हारी कमाई तो डर से है पकी हुयी, हमने तो बेलाग लूटा दिल से।
कह सकते हो हूँ मैं बड़ा घमंडी, कोई रहके इससे हूँ मैं दूर खड़ा।
होगा जो भी हाल मेरे तन का, तो भी ना कोई कुछ कर सकता मेरा।
फूटे इसके पुण्य का घड़ा, हम तो बहते रहेगे मस्ती की मौजों पे।
धर्म की दीवाल खड़ी की सारे जग में, दिया नाम उसका मंदिर मस्जिदों का।
अरे धर्म का मर्म न जाना कभी, हर भेद मिटानें के जगह भेदो का संसार बनाया।
हर जनम में नये – नये स्वांग रचाके, रहे अनजान अपने परम अस्तित्व से।
नाकारा हुये नाकार करके जीवन के हर दौर का थपेड़े खाके सत्य से दूर रहा।
- डॉ.संतोष सिंह
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धरा पे हर इक् का अस्तित्व है अलग अलग, मालिक है अपनी मर्जी का सब कोई।
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