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Hymn No. 2007 | Date: 01-Oct-2000
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आओ लोगों देखो जरा इंसा के रूप में कैसे रहता है शैतान।
आओ लोगों देखो जरा इंसा के रूप में कैसे रहता है शैतान।
बनता तो है करीबी प्रभु का, पर अंतर में तो हें आसुरी साम्राज्य।
बातें तो करता हें प्रेम की, पर दिल की बात कभी नहीं जानता।
उमदा से उमदा लोगों की संगत पायी, फिर भीरंगत चढ़ न पायी प्रेम की।
धोखो में खुद रहा तो ठीक था, पर धोखा दिया कई बार प्रभु को।
किस्मत का जोग ये कैसा है, जो भोगना न चाहके भोग रहा है।
भीतर ही भीतर पनपे झूठा असंतोष, लायकी न होने पे माँगे औकात से ज्यादा।
हर रोज जनमे भीतर ही भीतर नया राग, जीवित ही तपता रहे चिंताग्नि में।
प्रभु को न कहने करने की है जरूरत, मरेगा मौत अपने करमों से।
डरना न तुम सब ये गीत सुनके, करना प्रयास सच्चा प्रभु को जीतने वास्ते।
- डॉ.संतोष सिंह
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प्रभु दोष तो है तन मन में अनेक, कैसे कहूँ तू दूर कर कोई एक।
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