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Hymn No. 2113 | Date: 31-Dec-2000
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ला रहे है न जाने कितने जन्मों से, माया और अपने कर्मों से।
ला रहे है न जाने कितने जन्मों से, माया और अपने कर्मों से।
रह रहके तेरे नाम का हुंकार है भरते, दृड़ मन से प्रहार करते हुये।
अजीज हुआ नहीं हूँ, दिल लगाके युध्द करना चाहता हूँ मायावी संसार से।
सतत साधके वार करते हुये गवाऊँ प्राण, जो दम है बाजूओं में मेरे।
हार अब न है कबूल, जो जुड़ गया मेरे नाम के संग तेरा नाम।
मुझे ना फिकर अब अपनी, तेरी कथनी को करनी में बदलके गुजारूँ जीवन।
जीवन संग्राम में कदम न खींचू पीछे, कर डालूँ अब प्रहस्त प्रहार।
चोट हो इतनी गहरी विदीर्ण हो जायगी सारी लालसाये, फिर न दुस्साहस करेगी माया।
बनके रहूं जब तक इस जग में तो तेरी छाया, मोल न करूं कोई काया का।
उन्मुक्त कंठ से अनंत दिशाओं में, तमूल संगीत के बीच गाऊँ प्रेम गीत तेरा।


- डॉ.संतोष सिंह