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Hymn No. 2112 | Date: 28-Dec-2000
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ओढे रखता है तू क्यूँ इतनी लंबी खामोशी की चदरिया।
ओढे रखता है तू क्यूँ इतनी लंबी खामोशी की चदरिया।
जितनी हटाऊँ चदरिया उतनी ही तू ढाँप ले मुख मंडल तेरा।
तरस रहा हूँ अमृत से भरे दो बोल सुनने को तेरे।
न जाने दिल कितनी करता है चिरौरी, अनजान सुरों में पिरोके।
निर्मोही कैंसा हृद्य है तेरा, जो न पसीजे गीत सुनके हमारे।
पत्थरों को लावा बनके रोते देखा, जल को आकाश में उठते देखा।
हर असम्भव को सम्भव होते देखा, कब होगी पूरी हमारे दिल की साघ।
लगी है आग जो जलाये हमको, बुझने के बजाय बढ़ती जाये पल पल।
कोई न कोई जाम देके कर देता है तू हमारे प्यार को अस्वीकार।
सुना है तेरी हर बातों में राज है, ये कैसा राज है जो तू न बताये हमको।
- डॉ.संतोष सिंह
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